Guntur Kaaram Theatrical
लखनऊ की गलियों से उठती गंध, नशे की नहीं, सवालों की है। वो सवाल जो "गुंटूर का तड़का" के ट्रेलर में पूरे ज़ोर से उछल रहे हैं। ये कहानी सिर्फ 'सूखा दिन' की नहीं, बल्कि समाज के ढोंग, नशाखोरी और सच की तलाश की यात्रा है।
ट्रेलर की झलकियों में झांकें तो दिखते हैं लल्लू और सुमन। लल्लू, जिसके लिए हर महीने का एक 'सूखा दिन' रोज़ी के पेट पर लात मारता है। और सुमन, जिसके लिए ये दिन समाज को बदलने का मौका है। उनके टकराते नज़रिए, हवा खाने वाले तर्क, और घर की दहलीज़ पर फैला खामोशी का दरीबा - यही है फिल्म का असली मसाला।
लल्लू की नौटंकी सुमन के गुस्से को फूंकती है, तो बंटी, उनका बेटा, मीठे-तीखे सवालों से बड़ों की दुनिया को तिलमिला देता है। "क्या शराबबंदी सच में प्यास बुझाएगी, या और नशा लाएगी?" का सवाल बेधकर दिल में घर कर जाता है। ट्रेलर एक हंसी के झरोखे से झांकता है, लेकिन पीछे गहरी सोच का दरिया समेटे हुए है।
गुंटूर का तड़का सिर्फ लल्लू-सुमन की कहानी नहीं। ये फिल्म एक्स-रे की तरह समाज के अलग-अलग अंगों को परखती है। मजदूरों के लिए 'सूखा दिन' हथौड़े पर जंग लगने का दिन है, तो किसी के लिए ये अपराध के ग्राफ को नीचे लाने का जश्न है। ये दिखाता है कि कैसे दिखावे की नशाखोरी ज़िंदगी के हर कोने में छिपी है, सफेद कपड़ों में भी, कड़े कानूनों में भी।
लेकिन ये सिर्फ सवाल नहीं उछालता, बल्कि हंसी के ज़रिए उनका सामना भी करता है। हास्य फिल्म का नमक है, और गुंटूर का तड़का में ये नमक भरपूर है। लल्लू की ज़िद, सुमन का गुस्सा, बंटी की चालाकी - ये सब किरदार ज़िंदगी के ही टुकड़े लगते हैं, जिनकी हरकतें हसी ला देती हैं, सोचने पर मजबूर करती हैं।
तो, अगर आप एक ऐसी फिल्म देखना चाहते हैं जो हंसाए भी, रुलाए भी, और मन में सवालों का तूफान उठा दे, तो गुंटूर का तड़का आपके लिए ही बना है। ये फिल्म आपके ज़िंदगी के 'सूखा दिन' में एक तीखा, मसालेदार तड़का लगाएगी, जिसे ज़रूर चखना चाहिए।
रिलीज़ डेट का अभी पता नहीं, लेकिन ट्रेलर देखने के बाद यही इच्छा होती है कि ये फिल्म जल्दी से पर्दे पर आए। तो, नज़र रखिए इस अनोखी कहानी पर, और जब ये हंगामा मचे तो ज़रूर सिनेमाघर चलिएगा!
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